अवैध हिरासत के मामले में हाईकोर्ट ने देवरिया एसपी को लगाई कड़ी फटकार, पूछा- दोषी दरोगा निलंबित क्यों नहीं हुआ?
अदालत से नहीं, उन लोगों से माफी मांगिए’
हम भारती न्यूज़ से उत्तर प्रदेश चीफ व्यूरो प्रमुख धर्मेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की ख़ास ख़बर
देवरिया इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देवरिया में कथित अवैध हिरासत के मामले में पुलिस की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए देवरिया के पुलिस अधीक्षक अभिजीत आर. शंकर को फटकार लगाई। अदालत ने थाना गौरी बाजार के तत्कालीन प्रभारी के खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई न किए जाने पर सवाल उठाते हुए पूछा कि इतनी गंभीर लापरवाही के बावजूद उन्हें निलंबित क्यों नहीं किया गया।
मामला गौरी बाजार थाना क्षेत्र के सुपारी गांव में हुई एक युवक की गोली मारकर हत्या से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं महेंद्र गौर समेत चार लोगों ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर आरोप लगाया था कि पुलिस ने उन्हें बिना कानूनी प्रक्रिया के अलग-अलग अवधि में हिरासत में रखा। आरोप के अनुसार, 13 से 24 अप्रैल 2026 के बीच कुछ लोगों को करीब 10 दिनों तक थाने में रखा गया, मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की पीठ कर रही है। पिछली सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित अवधि के थाने के सीसीटीवी कैमरों और फुटेज की स्थिति की जानकारी मांगी थी। सुनवाई के दौरान पुलिस अधिकारियों की ओर से बताया गया कि थाने का सीसीटीवी कैमरा खराब था और काम नहीं कर रहा था। इस जवाब पर अदालत ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की।
‘अदालत से नहीं, उन लोगों से माफी मांगिए’
सुनवाई के दौरान एसपी की ओर से अदालत से माफी मांगे जाने पर न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने कहा कि अदालत से माफी मांगने के बजाय उन लोगों से माफी मांगनी चाहिए, जिन्हें कथित तौर पर अवैध हिरासत में रखा गया। अदालत ने थाना प्रभारी की कार्यशैली पर भी गंभीर टिप्पणी की और कहा कि जिसे सामान्य डायरी में जांच तक दर्ज करना नहीं आता, उसे सेवा में नहीं रहना चाहिए, एसपी ने अदालत को बताया कि संबंधित थाना प्रभारी को अपराध शाखा भेज दिया गया है। हालांकि, पीठ इस कार्रवाई से संतुष्ट नजर नहीं आई और सवाल किया कि यदि थाना प्रभारी प्रथम दृष्टया दोषी पाए गए थे तो उनके खिलाफ निलंबन जैसी सख्त कार्रवाई क्यों नहीं की गई, सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस अधिकारियों की ओर से दिए गए जवाबों पर तीखी मौखिक टिप्पणी भी की और पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए।
सीसीटीवी के लिए 46.46 लाख रुपये जारी होने पर भी सवाल
अदालत ने देवरिया के थानों में सीसीटीवी व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने अपने पूर्व आदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि थानों में सीसीटीवी लगाने के लिए राज्य सरकार की ओर से 46.46 लाख रुपये जारी किए गए थे। इसके बावजूद संबंधित थाने में सीसीटीवी के काम न करने की स्थिति सामने आने पर अदालत ने व्यवस्था और जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठाया, पीठ ने यह भी पूछा कि जब सीसीटीवी लगाने का काम पूरा नहीं हुआ था तो संबंधित एजेंसी को पूरी धनराशि का भुगतान किस आधार पर किया गया। अदालत ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय केवल आश्वासन के आधार पर भुगतान कर दिया गया, अदालत ने पुलिस अधिकारियों द्वारा की गई कार्रवाई की तारीख को लेकर भी सवाल उठाया। कोर्ट के अनुसार, अधिकारियों की ओर से बताई गई कार्रवाई 14 अगस्त 2026 की थी, जबकि संबंधित हाईकोर्ट का आदेश इससे पहले 4 अगस्त को ही पारित हो चुका था। पीठ ने प्रथम दृष्टया इस बात पर सवाल उठाया कि कहीं याचिका दाखिल होने और अदालत के आदेश के बाद ही कार्रवाई तो शुरू नहीं की गई।
अवैध हिरासत के आरोप पर 65 हजार रुपये मुआवजे का आदेश
कथित अवैध हिरासत के मामले में हाईकोर्ट ने चारों याचिकाकर्ताओं को कुल 65 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत के आदेश के अनुसार याचिकाकर्ता संख्या दो, तीन और चार को 20-20 हजार रुपये, जबकि याचिकाकर्ता संख्या एक को पांच हजार रुपये दिए जाएंगे। यह राशि संबंधित थाना प्रभारी के वेतन से वसूल किए जाने का निर्देश दिया गया है, हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों और मुआवजे के आदेश के बाद देवरिया पुलिस की कार्यशैली, थानों में सीसीटीवी व्यवस्था तथा हिरासत से जुड़े मामलों में अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
