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ढह गया प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ

 ढह गया प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ



ढह गया प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ,

    देख चाटुकारिता सारा विश्व दंग।

सच्चाई से न कुछ लेना देना,

    चढ़ा सत्य पर बेशर्मी का रंग।


कभी खड़ा होता पीड़ित के साथ,

     पकड़ता पीड़ित का हिलता हाथ।

सहलाता उसका कांपता माथ ,

    बनता शोषित का अदृश्य नाथ ।


चढ़ी सत्य की भावना भेंट ,

    विश्वास हो गया मटियामेट।

दलाली में व्यस्त हैं पहरेदार,

     सब लगे गरम करने में टेंट।


अब आस टूटी विश्वास टूटा ,

    टूट गया सदियों का संबंध।

देख चौथे स्तंभ की चाल को,

    जनमानस रो रहा होकर दंग ।।


       - हरी राम यादव 

         7087815074

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