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प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा को मंदिर, गौशाला और सार्वजनिक स्थानों पर यज्ञ आयोजन सामग्री: गोबर, घी, औषधीय लकड़ियाँ यज्ञ की राख का जल में प्रयोग → जल शुद्धिकरण

 हम भारती न्यूज़ 

मंडल व्यूरो चीफ राजेश्वर सिंह 

संभल से खास खबर



 


सम्भल ( बहजोई) 9 अप्रैल 2026*

जिलाधिकारी डॉ राजेन्द्र पैंसिया की प्रेरणा से  कलक्ट्रेट सभागार बहजोई में  गौशाला प्रबंधन, गोमय  उत्पाद, एवं प्राकृतिक खेती को लेकर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में मुख्य वक्ता रहे  सचिव गो संवर्धन आश्रम मोकलावास जोधपुर डॉ राकेश निहाल जी रहे।कार्यशाला में  जिलाधिकारी  डॉ राजेन्द्र पैंसिया, मुख्य विकास अधिकारी गोरखनाथ भट्ट, कृषि उपनिदेशक अरुण कुमार त्रिपाठी, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ शैलेन्द्र सिंह तथा  जिले के सभी पशु चिकित्सा अधिकारी तथा जनपद संभल के सभी ब्लॉक के किसान बंधु उपस्थित रहे। 

 आज की कार्यशाला में “प्रकृति, गौवंश और समाज का समन्वित विकास”पर चर्चा की गयी तथा 

 डॉ निहाल सिंह जी ने कहा कि आज हम सभी विभिन्न विभागों के अधिकारी, समाजसेवी और जागरूक नागरिक यहाँ एकत्रित हुए हैं। यह केवल एक बैठक नहीं है, बल्कि एक ऐसा अवसर है जहाँ से हम समस्याओं का समन्वित समाधान निकाल सकते हैं।

 उन्होंने कहा कि आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है  परस्पर पूरकता (Mutual Integration)

 तथा  प्रकृति के पंचमहाभूतों का शोधन

पंचमहाभूत — मिट्टी, जल, वायु, अग्नि और आकाश — ये केवल तत्व नहीं हैं, बल्कि हमारे जीवन का आधार हैं। यदि इनका संतुलन बिगड़ता है, तो समाज, स्वास्थ्य और पर्यावरण — सब प्रभावित होते हैं। उन्होंने कहा कि हमारे ऋषियों ने यज्ञ को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रक्रिया बताया है।

प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा को मंदिर, गौशाला और सार्वजनिक स्थानों पर यज्ञ आयोजन

सामग्री: गोबर, घी, औषधीय लकड़ियाँ

यज्ञ की राख का जल में प्रयोग → जल शुद्धिकरण

 इससे वायु शुद्धि, वर्षा संतुलन और रोग नियंत्रण में सहायता मिलती है।

 उन्होंने कहा कि  आवश्यकता अनुसार वृष्टि यज्ञ भी आयोजित किए जा सकते हैं।

 14 एकड़ का समन्वित गौ-आधारित मॉडल पर चर्चा की उन्होंने कहा कि 

कल्पना कीजिए एक ऐसा मॉडल—

14 एकड़ भूमि → 14 प्लॉट (प्रत्येक 1 एकड़)

हर प्लॉट में 5 दिन → 50 गायों की नियंत्रित चराई

70 दिन में पूरा चक्र पूरा → फिर पुनः पहले प्लॉट में वापसी। उन्होंने कहा कि इसका परिणाम होगा 

भूमि स्वतः उर्वर बनेगी

घास, पेड़, लताएं प्राकृतिक रूप से विकसित

गोबर-गोमूत्र से जैविक उर्वरता

यह एक Self-Sustaining Ecosystem Model बन सकता है।

 उन्होंने  जंगल-चरागाह विकास मॉडल पर चर्चा की 

वर्ष में 4 महीने (चातुर्मास) → चराई बंद

8 महीने → नियंत्रित चराई

👉 इससे:

बीज बनने का पूरा समय मिलता है

वनस्पतियों का प्राकृतिक विस्तार होता है

जंगल स्वतः पुनर्जीवित होते हैं

आज जंगल खत्म होने का बड़ा कारण है —

 बीज बनने से पहले चराई

इस मॉडल से यह समस्या समाप्त हो सकती है। उन्होंने गौवंश नस्ल संवर्धन पर भी चर्चा की उन्होंने कहा कि 

अच्छी नस्ल के नंदी (बैल) का चयन

बछड़ों को पर्याप्त पोषण

आयु के अनुसार वर्गीकरण:

2 वर्ष, 4 वर्ष, 6 वर्ष, 10 वर्ष…

उन्होंने कहा कि  पशुपालन विभाग, गौशाला और किसान मिलकर

सिस्टेमेटिक ब्रीडिंग प्रोग्राम चला सकते हैं।

 इससे दूध उत्पादन बढ़ेगा

स्वस्थ गौवंश तैयार होगा

बांझपन की समस्या घटेगी

 उन्होंने गोबर, चारा और कचरा प्रबंधन पर चर्चा की उन्होंने कहा कि 

आज सबसे बड़ी समस्या है — ट्रांसपोर्टेशन इसके समाधान पर चर्चा करते हुए कहा कि  टू वे सिस्टम (Two-way system) को अपना चाहिए 

जाते समय → गोबर

आते समय → चारा

 उन्होंने कहा कि नगर निकाय को 

कचरे का वर्गीकरण  करना चाहिए 

कंपोस्ट निर्माण

मिट्टी (रेत) को खेतों में उपयोग किया जाए इससे लागत घटेगी तथा 

कृषि उर्वरता बढ़ेगी

 बहु-स्तरीय वन (Multi-layer Forest Model)  पर चर्चा करते हुए कहा कि 

वन विभाग को चाहिए—

केवल एक प्रकार के पेड़ (Monoculture) नहीं लगाने चाहिए 

बल्कि 

पेड़, झाड़ियाँ ,घास ,लताएँ  लगायी जाएं। 

👉 विशेष पौधे:

बड़, जामुन, सहजन, निर्मली लगाने चाहिए इससे यह लाभ होगा कि 

परागण करने वाले कीट बढ़ेंगे

फल और उत्पादन बढ़ेगा

जैव विविधता मजबूत होगी

. जल प्रबंधन और प्राकृतिक शुद्धिकरण पर चर्चा करते हुए कहा कि 

छोटे-छोटे तालाब निर्माण से वर्षा जल संचयन किया जाए। 

इससे जलीय जीवों का संरक्षण भी होगा। 

 उन्होंने कहा कि पेड़-पौधों के पत्ते और फल मछली, मेंढक, कछुए का भोजन होता है इससे  जल शुद्धि भी होता है 

यह एक Natural Water Treatment System बन सकता है। प्रशिक्षण और जन सहभागिता पर चर्चा करते हुए कहा कि 

हर मॉडल तभी सफल होगा जब—

लोग समझेंगे  तथा लोग जुड़ेंगे

स्कूल/कॉलेज म…

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