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फिरोजाबाद । आधुनिक डिजिटल युग में जहां जीपीएस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और स्मार्ट टेक्नोलॉजी का तेजी से विस्तार हो रहा है

 डिजिटल युग में घंटाघर के जीर्णोद्धार पर करोड़ों खर्च को लेकर उठे सवाल....




फिरोजाबाद । आधुनिक डिजिटल युग में जहां जीपीएस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और स्मार्ट टेक्नोलॉजी का तेजी से विस्तार हो रहा है तथा लगभग हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल फोन और उसमें डिजिटल घड़ी उपलब्ध है, ऐसे समय में नगर में मूलभूत सुविधाओं की अनदेखी कर करोड़ों रुपये घंटाघर के जीर्णोद्धार पर खर्च किए जाने को लेकर लोगों के बीच चर्चा और असंतोष का माहौल बना हुआ है।

नगर क्षेत्र में एक ओर बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, आपदा प्रबंधन, शेल्टर होम, सार्वजनिक बस सेवाएं और गरीबों के आवास जैसी आवश्यक सुविधाओं का अभाव बना हुआ है, वहीं दूसरी ओर लगभग 1 करोड़ 27 लाख रुपये की भारी धनराशि केवल घंटाघर के जीर्णोद्धार कार्य पर खर्च किए जाने की योजना ने कई सामाजिक संगठनों और नागरिकों को सवाल उठाने पर मजबूर कर दिया है।


स्थानीय लोगों का कहना है कि, जिस धनराशि से घंटाघर का सौंदर्यीकरण और मरम्मत कराई जा रही है, उसी राशि का उपयोग जनहित की योजनाओं में किया जाता तो दर्जनों परिवारों को स्थायी राहत मिल सकती थी। नागरिकों ने उदाहरण देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत यदि प्रति लाभार्थी लगभग ढाई लाख रुपये की लागत मानी जाए, तो 1 करोड़ 27 लाख रुपये में लगभग 50 जरूरतमंद परिवारों के पक्के आवास बनाए जा सकते थे। इससे गरीब और बेघर लोगों को स्थायी छत मिलने के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा भी सुनिश्चित होती।


नगर के बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह भी प्रश्न उठाया कि, जब इतनी बड़ी राशि उपलब्ध है, तो स्थानीय बेरोजगार मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराते हुए अपेक्षाकृत कम लागत में नया घंटाघर क्यों नहीं बनाया जा सकता। उनका कहना है कि ढाई लाख रुपये की लागत में आधुनिक तकनीक और स्थानीय संसाधनों की मदद से एक नया घंटाघर तैयार किया जा सकता है, जबकि शेष धनराशि को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी आवश्यक योजनाओं में लगाया जा सकता था।


कई नागरिकों ने आरोप लगाया कि, विकास की प्राथमिकताएं आम जनता की वास्तविक जरूरतों से भटकती जा रही हैं। नगर में आज भी कई मोहल्लों में सड़क, जलनिकासी, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं और सार्वजनिक परिवहन जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित हैं तथा गरीब परिवार आवास और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।


सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि, सार्वजनिक धन के उपयोग में पारदर्शिता लाई जाए और विकास योजनाओं में आम जनता की प्राथमिक आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जाए। उनका कहना है कि सौंदर्यीकरण और प्रतीकात्मक निर्माण कार्यों से अधिक महत्वपूर्ण जनता के जीवन स्तर को बेहतर बनाना है।


नगरवासियों का मानना है कि, यदि विकास योजनाओं में जनहित को केंद्र में रखा जाए, तो सीमित संसाधनों में भी शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और रोजगार जैसे क्षेत्रों में बड़ा बदलाव संभव है। फिलहाल घंटाघर के जीर्णोद्धार को लेकर नगर में बहस तेज हो गई है और लोग प्रशासन से इस परियोजना की उपयोगिता एवं खर्च के औचित्य पर जवाब मांग रहे हैं।

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